Saturday, 5 December 2015

बच्चे की अक्लमंदी बनी सीख

सीट पर कब्ज़ा करना बचपन से ही बच्चे सीख लेते हैं। किससे कैसे सीट हड़पनी है अच्छे से सीखते हैं जो आगे बड़े होकर ट्रेन और बस में काम आता है।

कल मैं कानपुर से लखनऊ जा रहा था तभी जनरल कोच में एक बच्चे के पिता ने खिड़की से रुमाल फेक दी और भीड़ के साथ जब वह व्यक्ति कोच में आया तो देखा कोई और बैठा हुआ है। वह दूसरे व्यक्ति से झगड़ने लगा कि मेरी रुमाल यहां रखी थी फिर भी तुम बैठ गए। ये झगड़ा बच्चा देखता रहा और किसी तरह सीट पा ली।
थोड़ी देर बाद एक बुजुर्ग व्यक्ति कोच में आया। काफी देर बुजुर्ग ने आस पास देखा सीट के लिए लेकिन वहां सब सीट पर पहले से ही कब्ज़ा किये बैठे थे। यत्रियों से खचाखच भरे कोच में खड़े रहने की जगह मिल जाए वही काफी है।

अचानक बच्चे ने खड़े होकर अपनी सीट बुजुर्ग को दे दी। यह देख उसके पिता गुस्सा हो गए और सभी के सामने उसको डांटने लगे "क्यों तुम उठे अपनी सीट से?
अब तुम खड़े होकर जाना घर और समझाने लगे कि कभी अपनी सीट किसी को मत दिया करो अभी नही सीखोगे तो कब सीखोगे।"आँखों में आंसू लिए बच्चे ने कहा, "पापा स्कूल में मैम ने सिखाया था कि सफर में अगर कोई बुजुर्ग खड़े हुए यात्रा करते दिखे तो उनकी मदद करते हुए अपनी सीट देना चाहिए।" पिता की आँखों में शर्मिंदगी दिखी कि मानवता तो कही गुम सी हो गई थी मुझमे। कोच में बैठे सभी यात्री एक सुर में बोले सही बात बोली आपके बच्चे ने। बच्चे के पिता बोले, "आज मुझे यकीन हो गया कि तू आगे चलकर मेरी लाठी जरूर बनेगा,मुझे गर्व है तुमपे।

- अर्पित ओमर

Sunday, 10 May 2015

मदर्स डे स्पेशल

आज के दिन कोई अपनी मां को तोहफा देकर अपनी भावनाओं को बताता है तो कोई कविता या अपनी लेखनी से मां को खुश करने की कोशिश करता है। बच्चों के लिए मां का प्यार कभी कम नहीं होता, यह एक ऐसा रिश्ता है जिसमें कभी-भी इंसान दूर नहीं जाता, चाहे वह किसी भी उम्र के पड़ाव में हो। मां के लिए बच्चों की भावनाएं हमेशा चरम पर होती हैं।

बचपन से लेकर बुढ़ापे तक मां कभी अपने बच्चों को दूर नहीं जाने देना चाहती। आज के दौर में हर कोई पढ़ाई और जॉब के लिए अपने घर से बाहर दूसरे शहर में जाता है और मां अपने दिल में पत्थर रखकर बच्चे की खुशी के लिए घर से बाहर जाने की अनुमति देती हैं। सुबह से रात तक मां अपने बच्चों की दिल से जितनी सेवा करती हैं शायद ही कोई और रिश्ता होगा जिसमें खुद से ज्यादा कोई किसी को प्यार करता है। घरेलू कलह से लेकर बटवारे तक के विवाद में सभी रिश्ते तारतार हो जाते हैं लेकिन मां और बच्चे का रिश्ता सदा बना रहता है।फिल्मी दुनिया की बात हो या वास्तविक जीवन की, दोनों ही तस्वीरों में मां और बच्चे के लिए सदा एक ही देखने को मिलेगा। मां का आशीर्वाद अपने बच्चों पर सदा बना रहता है। घर हो या बाहर हर जगह मां अपने बच्चों का ध्यान रखती हैं। पूरे घर में सबसे ज्यादा कार्य करने वाली मां जो बिना किसी स्वार्थ के, बिना किसी लोभ के अपने बच्चों की सभी जरूरतों का समयानुसार ध्यान रखती हैं। धरती की तरह मां भी अपने बच्चों की सुरक्षा कवच बनती हैं। बच्चे की एक आह से मां के कलेजे में उठा दर्द किसी गम्भीर चोट से कम नहीं होता है।

कहते हैं बेटे मां के लाडले और बेटियां पिता की लाडली होती हैं। मां प्यार दोनों से करती हैं लेकिन तवज्जो बेटे को ज्यादा देती हैं लेकिन वास्तविकता में मां दोनों से बेहद प्यार करती हैं। समय बदल रहा है लेकिन मां और बच्चे के रिश्ते में कोई परिवर्तन नहीं आया। बड़े हों या बच्चे जो भी अपने घर से दूर रह रहे हैं, वह जरूर अपनी
मां को मिस करते हैं। मां के अनेक नाम मम्मा, मॉम, मां और भी नामों से मां को बुलाया जाता है। मां के हाथ का बना खाना सभी को बेहद अच्छा लगता है। जिस तरह हम सभी हर किसी खास के लिए एक दिन निश्चित कर लेते हैं उसी तरह मदर्स डे भी एक महत्वपूर्ण दिन का हिस्सा है। जो लोग कहते हैं कि आज ही क्यों लोग अपनी मदर्स को याद करके विश कर रहे हैं ? क्या वे रोज़ नहीं याद करते ? तो जनाब आपको बता दें कि प्यार हम सभी से रोज़ करते हैं लेकिन जिस तरह हम बर्थ डे मनाते हैं, फ्रेंडशिप डे मानते हैं, टीचर डे मनाते हैं, चिल्ड्रेन डे मानते हैं, वेलेंटाइन का तो पूरा पूरा हफ्ता मनाते हैं नए साल का जश्न मानते हैं और भी तमाम दिन को उत्साह से मनाते हैं उसी तरह मदर्स डे भी मनाते हैं इसलिए हर डे को खुलकर मनाइए। यकीन मानिए आपको दिल से ख़ुशी मिलेगी।

-    अर्पित ओमर

Monday, 20 April 2015

मंदिरों में हो रही धन उगाही का जिम्मेदार कौन ?

उड़ीसा में जगन्नाथपुरी हो या राम की जन्मभूमि अयोध्या, तिरुपति बालाजी हो या चारोंधाम की यात्रा। जितना बड़ा और मान्यता प्राप्त मंदिर उतनी ज्यादा लूट। तेजी से बढ़ते दौर में लोगों की समस्याएँ इतनी ज्यादा हो चुकी हैं कि भक्त अब भगवान से प्रेम कम बल्कि उनसे डरने लगे हैं और अपना दिमाग ना लगाकर पंडितों के दिमाग से चलने लगे हैं। इस बात का फायदा उठाते हुए धीरे - धीरे यह एक बाजारीकरण में परिवर्तित हो रहा है। यह एक ऐसा बाजार बनकर उभर रहा है जहाँ सैकड़ों तरह के रीति - रिवाज और साथ ही दुःख - दर्द मिटाने के तमाम तरीके जिन्हें करना एक आम इंसान के लिए ना सिर्फ मुश्किल बल्कि सिर के बल खड़े होने के बराबर है। आलम यह है कि मंदिरों में बाहर घूम रहे सैकड़ों पंडा अपनी - अपनी कहानी गढ़ते हुए मंदिर में आए हुए भक्तों को इतना भयभीत कर रहे हैं कि भक्त अब अपना सब कुछ लुटा दे, नहीं तो जो कुछ भी है वो भी चला जाएगा।

मंदिरों में आस्था के नाम पर हो रही धन उगाही एक ऐसा बाज़ार बन गया है जिसमें पंडित अपने अनुसार मंदिर में भेंट चढ़वाते हैं पंडितों का तरीका कुछ इस प्रकार होता है –

पंडित – हथेली में चरणामृत (तुलसी युक्त जल) लीजिये, चरणामृत को हाथ में रखे रहिये. अपना नाम बताइए।
भक्त – राजेश (काल्पनिक नाम)।
पंडित – (पंडित द्वारा कुछ मन्त्र बोलने के बाद) बोलो, मैं राजेश अपनी सभी समस्याओं के निवारण हेतु भगवान् के चरणों में 501 रूपए देना चाहता हूँ।

कुछ इस तरह का वाक्या आपके साथ भी हुआ होगा तब आप बाहर जाकर सोचते हैं कि यार ये अजीब नौटंकी है। मुझे कितना भेंट चढ़ाना है ये मेरी श्रद्धा पर निर्भर करता है नाकि पंडित द्वारा कहे जाने पर ? हर तरफ लूट ही लूट मची हुई है। भक्त अब खुद नहीं समझ पा रहे कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं। देखा - देखी में भक्त ये सब चीजो को अनदेखा कर देते हैं और जो सब कर रहे हैं उसी राह में खुद भी चलने लगते है। अब समय है जागरूक बनने का और सही - गलत में फर्क समझने का .......

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
अर्थ - कर्म ही पूजा है। फल की इच्छा मत करो। समय आने पर फल मिल जाएगा। अपने कर्म करते रहो।

इन पंक्तियो को सभी अच्छे से जानते हैं और समझते भी है इसके बावजूद मंदिरों में कोई भक्त घुटनों में जा रहा है कोई लेट-लेट कर जा रहा है कोई अपनी सारी संपत्ति दान कर रहा है। आखिर भगवान क्यों चाहेंगे कि उनके बच्चे इतना ज्यादा कष्ट सहें और इस झूठी बातों पर जियें कि अगर वो इस तरह के दर्द सहेंगे तो भगवान स्वयं प्रकट होकर उनकी सहायता करेंगे ?

इस पूरे खेल में पंडितों की पूरी गलती है यह कहना गलत है क्योंकि जब भक्त ही अपना सब कुछ लुटा देना चाहते हैं तो फिर पंडित क्यों ना बनाएं धन उगाही का खुला बाजार ... मंदिरों के बाहर बिक रहे दूध के गिलास जिन्हें पीने के लिए कोई नहीं खरीदता बल्कि मंदिरों में चढ़ाने के लिए हजारों लीटर दूध बिकता है जिसका कहीं भी इस्तेमाल नहीं होता। पूरा का पूरा दूध फूलों और पानी के साथ मिलते हुए बह जाता है। क्या ये सब देख भगवान् खुश होते हैं ? बिलकुल ही अजीब समाज में जी रहे है हम लोग...........

अगर आपको मेरे इस लेख में कोई भी बात अच्छी लगी हो तो आज से ही खुद में परिवर्तन लाइए और इन तमाम बातों को दरकिनार कर खुद के दिमाग से काम लीजिये अन्यथा यह सिलसिला ऐसा ही चलता रहेगा ......

-    अर्पित ओमर (पत्रकार)

Sunday, 19 April 2015

काश ! हमारी ज़िन्दगी में भी एक डस्टर होता….

काश ! हमारी ज़िन्दगी में भी एक डस्टर होता…. जिससे हम समाज की बुराइयों को मिटा सकते . . . भ्रष्टाचार को मिटा सकते ... महंगाई को मिटा सकते .... अन्याय को मिटा सकते .......
तेजी से बढ़ते समाज में जिस तरह स्वार्थ, बदले की भावना और तेरा-मेरा की भावना पैदा हो रही है इसे डस्टर से मिटाना बेहद जरुरी है ..........

समाज में एक तरफ कुछ लोग जाति – धर्म के नाम पर भेदभाव और अपना - पराया की मानसिकता पैदा करते है और लोगों को इसे जबरदस्ती अपनाने को कहते है उसी जगह दूसरी तरफ लोग इसे व्यवसाय के रूप में डरा कर एक अच्छा खासा बिजनेस चला रहे हैं ..... यहाँ पर डस्टर का अर्थ सिर्फ एक वस्तु से नहीं वरन समाज में हो रही बुराइयों को साफ़ करने वाला डस्टर है .....
कभी ना कभी कहीं ना कही आप भी इस वाक्य के शिकार हुए होंगे कि ‘चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे?’ जी हाँ ये वही समाज है जहाँ आप और हम एकता की बात करते हैं एक नए परिवर्तन की बात करते हैं बुराइयों को दरकिनार कर अच्छाइयों की बात करते हैं लेकिन ये चार लोग आखिर हैं कौन ? कभी सोचा ? कभी जाना ? कभी समझा ? शायद नहीं ! क्योंकि यह सोच हमारे दिमाग में बैठा दी गई है.... कभी इसके आगे सोचने का ना मौका मिला और ना ही कभी किसी ने मौका दिया कि इसके बारे में भी सोचो कि आखिर ये होता है तो क्यों होता है इसके पीछे क्या कारण है ?

रीति रिवाज के नाम पर सदियों से चली आ रही परम्परा को बदलना नहीं चाहते चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन अपने दैनिक जीवन खान पान, पहनावे में हर रोज एक नया परिवर्तन कर रहे है ........ सुबह चाय की चुस्की लेते हुए जब परंपरा की बात आती है तब सभी के मुह से उफ्फ्फ निकलता है और वे भलीभांति जानते है कि उनका इन सबमे अब बिलकुल मन नहीं लगता क्योंकि ना ही उनके पास इसके लिए समय है और ना ही वे अब इन ढकोसलेनुमा बातों को मानते है जिनका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध ही नहीं है मात्र कल्पना है. ये किस तरह का दोगुला समाज है जो समय के साथ खुद को परिवर्तित कर रहा है लेकिन रीति रिवाज और परम्पराएं जस की तस बनी हुई हैं. अब वाकई इसे एक डस्टर की जरुरत है जो इन सभी खोखले दिखावे को मिटाकर एक पारदर्शी समाज को विकसित करेगा और हर बात के पीछे एक ठोस लॉजिक होगा.

भ्रष्टाचार की उपज भी इस समाज से ही निकली है. उसी स्वार्थ से निकली से जिसमे गलत तरीके से कम समय में ज्यादा पाने की इच्छा पैदा होती है और भ्रष्टाचार बनकर एक कड़ी के बाद आगे दूसरी कड़ी बनकर बढती जाती है और छोटे लेवल से शुरू होकर यह बड़े लेवल तक बड़ी सफाई के साथ होता है. जब तक इंसान खुद में बदलाव नहीं लाएगा तब तक भ्रस्टाचार जैसी खतरनाक वायरस समाज को और अन्दर से खोखला बनाएगी और वो दिन दूर नहीं जब एक दूसरे के प्रति विश्वास में कमी आना शुरू हो जाएगी भ्रस्टाचार के नाम पर.

इसी से जुड़ता हुआ एक और वायरस बढ़ रहा है जो है महंगाई. जब भ्रस्टाचार होता है तब चीजो की मात्रा में कमी आती है और उस चीज के मूल्य में हुई वृद्धि एक महंगाई के रूप में हमारे सामने आती है ......डस्टर एक नई मुहीम बनकर आगे बढेगा जो इन तमाम बुराइयों को मिटाएगा . आज न्याय के लिए लड़ने वालों को जब तक न्याय मिलता है तब तक अभियुक्त अपने जीवन को पूर्णतया जी चुका होता है ......... ऐसे में जरुरत है न्याय व्यवस्था को और बेहतर बनाने के साथ ही डस्टर चलाओ अभियान की भी जिससे आने वाले समय में आने वाली पीढ़ी को एक साफ़, स्वस्थ्य और सकारात्मक माहोल मिल सके....... जब तक हम आपने आस पास की समस्याओं में ही फंसे रहेंगे तब तक हम भारत के विकास के बारे में नहीं सोच पाएँगे ....... विकास के लिए सबसे जरुरी है अपनी समस्याओं को पहले हल करें फिर विकास के बारे में सोचे
काश एक डस्टर होता जिससे इन सारी समस्याओं को मिटा सकते ...........काश !

Saturday, 14 February 2015

मुझे शिकायत है समय से . . .

जी हाँ, समय . .  जो कभी किसी के लिए नहीं रुकता, कभी किसी की परवाह नहीं करता। कभी अच्छा होता है समय तो कभी बुरा। लोग जिस तरह समय को कोसते हैं उसी तरह मुझे भी एक शिकायत है समय से। आज मेट्रो की रफ़्तार से समय दौड़ रहा है ऐसे में न हम खुद को समय दे पाते हैं और न ही अपने परिवार को। हर एक समस्या के बाद दूसरी समस्या बेसब्री से इंतजार कर रही होती है कि कब मुझमें व्यस्त हो जाओ और समय से शिकायत करो। काश 24 घंटे की जगह अगर 42 घंटे होते तो कितना अच्छा होता। हम कुछ समय अपने परिवार, मित्रों, मनोरंजन व अन्य तमाम कार्यों को आसानी से कर पाते और किसी को कोई बहाना भी नहीं बनाते कि “यार समय नहीं मिला।”

टेक्नोलॉजी का जहाँ एक तरफ लोग अपने समय को बचाने के लिए प्रयोग कर रहे हैं वहीँ दूसरी ओर लोग अब फोन पे ही हाल चाल लेकर बैठ जाते हैं, मिलने की ज़हमत उठाना भी ज़रुरी नहीं समझते। क्या लोग आलसी हो गए हैं ? या समय ही उनकी असली शिकायत है जो उन्हें बांधे रखता है। क्या इसे हम समय में आए परिवर्तन की श्रेणी में रखें या इंसान के व्यवहार में आए परिवर्तन की श्रेणी में ? समय पर अपना ज़ोर पाने के लिए इंसान ने हर सम्भव तरीके से कोशिश की लेकिन परिणामस्वरूप इंसान अपनी ज़रूरतों और असंतुष्टि की वजह से अपने कार्यों और परेशानियों में और ज्यादा फंसता जा रहा है। आखिर क्यों ये समय हमसे ख़फा रहता है और हमें अनचाही परिस्थितियों में फंसा देता है।

अस्पताल में डाक्टर कहते हैं कि “अब समय बहुत कम है जल्दी इलाज करवाइए वरना हम कुछ नहीं कर पाएँगे।” तो जनाब ये बताइए कि और अधिक समय कहाँ से लाऊं, किससे उधार मांगूं ? हर क्षण हर लम्हा हर पल सिर्फ गुहार लगाई जाती है कि भगवान थोडा समय और दे दो। बचपन से ही स्कूल की परीक्षाओं में और अधिक समय माँगना शुरू कर देते हैं कि बस 5 मिनट और मिल जाता तो वो आखिरी सवाल भी हल हो जाता। हर चीज़ का समाधान है इस दुनिया में लेकिन समय पर किसी का ज़ोर नहीं। जन्म से लेकर म्रत्यु तक हम सिर्फ एक ही चीज़ की शिकायत रहती है, और वो है समय। जैसे - जैसे समय नज़दीक आता है हमारे चेहरे पर डर और चिंता साफ़ झलकती है। आज मेरे मन में समय को लेकर शिकायत इसलिए पैदा हुई क्योंकि यह शिकायत सिर्फ मेरी नहीं बल्कि सड़क पर चल रहे हर दूसरे व्यक्ति की है जो अपनी तकलीफों को सिर्फ अपने अन्दर दबा कर रखता है।

सड़क दुर्घटना में सबसे ज्यादा तर्क समय को दोष देते हुए पीड़ित अपने भाव को बताता है कि “काश समय की कमी और जल्दी पहुँचने की ललक मुझमें न होती तो आज मैं इस अस्पताल में ना होता।” क्या समय को पकड़ना ही हमारी सबसे बड़ी भूल और बेवकूफी है ? हम आज उस चीज़ को ज्यादा तवज्जो देते हैं जो हमे नहीं मिल सकती है। हमेशा उसी को पसंद करते हैं जो हमारे समय के अनुकूल नहीं होती, और फिर कहते हैं कि समय ख़राब चल रहा है। ऐसे तमाम मामले हैं जिसमें समय से लोग शिकायत करते हैं आखिर क्यों ? क्यों ? और क्यों ? कभी समय हो तो बैठकर सोचियेगा . . . ओह ! आपके पास तो समय ही नहीं है . . .

- अर्पित ओमर 

Sunday, 8 February 2015

बुजुर्ग महिला का हौसला

रोजाना लखनऊ से कानपुर की रेलयात्रा तो होती रहती है लेकिन कभी कभी यात्रा के दौरान कुछ ऐसे यात्रियों से मुलाकात होती हैं जिनसे मिलने के बाद आपको लगेगा कि इस दुनिया में सिर्फ हमही परेशानियों का सामना नहीं कर रहे हैं सभी के पास अपनी गंभीर समस्याएँ हैं। कोई बीमारी से पीड़ित है तो कोई आर्थिक रूप से, कोई अपने परिवार से परेशान है तो कोई खुद की गलत आदतों से पीड़ित है। इस भागती दौड़ती ज़िन्दगी में खुद के बारे में सोचने के लिए किसी के पास समय नहीं है, सभी खुद में व्यस्त हैं।

बात है उन दिनों की जब नए साल का आगाज हुआ था और लोग अपने शहर या गाँव रेल से जा रहे थे तभी जनरल डिब्बे में एक व्यक्ति अपनी सिगरेट को अँगुलियों में फंसाए हुए बोला कि "माचिस है क्या ?" डिब्बे में बैठे व खड़े सभी यात्री के चेहरे पर उसके प्रति गुस्से की भावना दिख रही थी तभी मैंने जवाब दिया कि "नहीं है लेकिन क्यों चाहिए ?" व्यक्ति बोला कि "दिखाई नहीं देता सिगरेट जलानी है।" मैंने कहा कि "तुम इस सिगरेट से खुद को क्यों बर्बाद कर रहे हो और साथ ही यहाँ बैठे अन्य यात्री भी तुम्हारे धुंए की वजह से तमाम बिमारियों का शिकार हो सकते हैं।"

तभी एक बुजुर्ग महिला छोटे से थैले में ढेर सारे अमरुद के साथ बोलते हुए निकली कि "5 के दो अमरुद, 5 के दो अमरुद।" हालाँकि उस जनरल डिब्बे में तनिक भी जगह नहीं थी कि महिला चलती गाड़ी में एक स्थान से दूसरे स्थान जा सके क्योंकि सभी जनरल डिब्बे इस कदर भरे हुए थे कि सीटों के अलावा लोग डब्बे की जमीन पर भी कुछ खड़े व बैठे हुए थे। वह व्यक्ति उस बुजुर्ग महिला से बोला कि "अमरुद बेच रही हो या बादाम, इतने महंगे" उस बुजुर्ग महिला ने जवाब दिया कि "तुम्हारी सिगरेट से तो लाख गुना अच्छा है ये अमरुद, एक सिगरेट तुम 5 रूपए में खरीदकर खुद को मौत के मुंह में धकेल रहे हो उससे अच्छा है 5 रूपए के दो अमरुद खा लो। तुम सिगरेट - शराब पीकर सारे पैसे बर्बाद करते हो, घर में अनाज का दाना तक नहीं होता लेकिन सिगरेट शराब पीने के लिए तुम लोगों के पास हमेशा पैसे रहते हैं। मै अपना पेट भरने के लिए इस उम्र में भी अमरुद बेच कर अपना घर चला रही हूँ, माना कि अमरुद महंगे बेच रही हूँ लेकिन उनसे तो लाख गुना अच्छी हूँ जिनके हाथ पैर सही सलामत होने के बावजूद सड़क और ट्रेनों में भीख मांगते हैं। मैं बूढी जरुर हो गई हूँ लेकिन जब तक मुझमे जान है तब तक मै काम करुँगी और मेहनत करके अपना पेट भरुंगी।"

व्यक्ति ने कहा कि "सिगरेट से मुझे सुकून मिलता है दुनिया के तमाम झंझटों और सिर दर्दी से राहत मिलती है। बुजुर्ग महिला बोली कि "जिसे तुम राहत का नाम दे रहे हो वो तुम्हारी मौत की आहट है, ये नशा बन चुकी है तुम्हारा। तुम्हे लगता है कि इससे तुम्हे सुकून मिलता है लेकिन असलियत में ऐसा नहीं है। तुम मेरे बेटे की उम्र के हो इसलिए तुम्हे समझा रही हूँ कि गुटखा, सिगरेट और शराब सिर्फ एक नशा है जो इंसान को खाता है।"

उस व्यक्ति ने माफ़ी मांगते हुए बुजुर्ग महिला से कहा कि "आप सही बोल रही हैं मेरे घर में हर रोज इसी को लेकर बहस होती है जिससे मेरे परिवार में अशांति बनी हुई है और आर्थिक रूप से भी मैं कमजोर रहता हूँ साथ ही किसी भी काम में अब मन भी नहीं लगता। आज से ही मैं इस सिगरेट को अपनी ज़िन्दगी से ख़त्म करता हूँ।" ऐसा बोलते हुए व्यक्ति ने अपनी सिगरेट को खिड़की से बाहर फेक दिया और बुजुर्ग महिला से अमरुद खरीदा। मेरे साथ - साथ वहां बैठे सभी यात्रियों के चेहरे पर मुस्कान आ गई और सभी ने बुजुर्ग महिला के हौसले और उसकी विचारों की प्रशंसा की।

- अर्पित ओमर