Sunday, 19 April 2015

काश ! हमारी ज़िन्दगी में भी एक डस्टर होता….

काश ! हमारी ज़िन्दगी में भी एक डस्टर होता…. जिससे हम समाज की बुराइयों को मिटा सकते . . . भ्रष्टाचार को मिटा सकते ... महंगाई को मिटा सकते .... अन्याय को मिटा सकते .......
तेजी से बढ़ते समाज में जिस तरह स्वार्थ, बदले की भावना और तेरा-मेरा की भावना पैदा हो रही है इसे डस्टर से मिटाना बेहद जरुरी है ..........

समाज में एक तरफ कुछ लोग जाति – धर्म के नाम पर भेदभाव और अपना - पराया की मानसिकता पैदा करते है और लोगों को इसे जबरदस्ती अपनाने को कहते है उसी जगह दूसरी तरफ लोग इसे व्यवसाय के रूप में डरा कर एक अच्छा खासा बिजनेस चला रहे हैं ..... यहाँ पर डस्टर का अर्थ सिर्फ एक वस्तु से नहीं वरन समाज में हो रही बुराइयों को साफ़ करने वाला डस्टर है .....
कभी ना कभी कहीं ना कही आप भी इस वाक्य के शिकार हुए होंगे कि ‘चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे?’ जी हाँ ये वही समाज है जहाँ आप और हम एकता की बात करते हैं एक नए परिवर्तन की बात करते हैं बुराइयों को दरकिनार कर अच्छाइयों की बात करते हैं लेकिन ये चार लोग आखिर हैं कौन ? कभी सोचा ? कभी जाना ? कभी समझा ? शायद नहीं ! क्योंकि यह सोच हमारे दिमाग में बैठा दी गई है.... कभी इसके आगे सोचने का ना मौका मिला और ना ही कभी किसी ने मौका दिया कि इसके बारे में भी सोचो कि आखिर ये होता है तो क्यों होता है इसके पीछे क्या कारण है ?

रीति रिवाज के नाम पर सदियों से चली आ रही परम्परा को बदलना नहीं चाहते चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन अपने दैनिक जीवन खान पान, पहनावे में हर रोज एक नया परिवर्तन कर रहे है ........ सुबह चाय की चुस्की लेते हुए जब परंपरा की बात आती है तब सभी के मुह से उफ्फ्फ निकलता है और वे भलीभांति जानते है कि उनका इन सबमे अब बिलकुल मन नहीं लगता क्योंकि ना ही उनके पास इसके लिए समय है और ना ही वे अब इन ढकोसलेनुमा बातों को मानते है जिनका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध ही नहीं है मात्र कल्पना है. ये किस तरह का दोगुला समाज है जो समय के साथ खुद को परिवर्तित कर रहा है लेकिन रीति रिवाज और परम्पराएं जस की तस बनी हुई हैं. अब वाकई इसे एक डस्टर की जरुरत है जो इन सभी खोखले दिखावे को मिटाकर एक पारदर्शी समाज को विकसित करेगा और हर बात के पीछे एक ठोस लॉजिक होगा.

भ्रष्टाचार की उपज भी इस समाज से ही निकली है. उसी स्वार्थ से निकली से जिसमे गलत तरीके से कम समय में ज्यादा पाने की इच्छा पैदा होती है और भ्रष्टाचार बनकर एक कड़ी के बाद आगे दूसरी कड़ी बनकर बढती जाती है और छोटे लेवल से शुरू होकर यह बड़े लेवल तक बड़ी सफाई के साथ होता है. जब तक इंसान खुद में बदलाव नहीं लाएगा तब तक भ्रस्टाचार जैसी खतरनाक वायरस समाज को और अन्दर से खोखला बनाएगी और वो दिन दूर नहीं जब एक दूसरे के प्रति विश्वास में कमी आना शुरू हो जाएगी भ्रस्टाचार के नाम पर.

इसी से जुड़ता हुआ एक और वायरस बढ़ रहा है जो है महंगाई. जब भ्रस्टाचार होता है तब चीजो की मात्रा में कमी आती है और उस चीज के मूल्य में हुई वृद्धि एक महंगाई के रूप में हमारे सामने आती है ......डस्टर एक नई मुहीम बनकर आगे बढेगा जो इन तमाम बुराइयों को मिटाएगा . आज न्याय के लिए लड़ने वालों को जब तक न्याय मिलता है तब तक अभियुक्त अपने जीवन को पूर्णतया जी चुका होता है ......... ऐसे में जरुरत है न्याय व्यवस्था को और बेहतर बनाने के साथ ही डस्टर चलाओ अभियान की भी जिससे आने वाले समय में आने वाली पीढ़ी को एक साफ़, स्वस्थ्य और सकारात्मक माहोल मिल सके....... जब तक हम आपने आस पास की समस्याओं में ही फंसे रहेंगे तब तक हम भारत के विकास के बारे में नहीं सोच पाएँगे ....... विकास के लिए सबसे जरुरी है अपनी समस्याओं को पहले हल करें फिर विकास के बारे में सोचे
काश एक डस्टर होता जिससे इन सारी समस्याओं को मिटा सकते ...........काश !

2 comments:

  1. Sabse bada rog
    Kya kahenge log..

    Nice article arpit

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  2. society is now a days really very dominating ........... ye tabhi badlega jab hum log badlenge ise .. warna jaisa chal raha hai waisa chalta rahega ....
    gud observation arpit .......

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