Monday, 20 April 2015

मंदिरों में हो रही धन उगाही का जिम्मेदार कौन ?

उड़ीसा में जगन्नाथपुरी हो या राम की जन्मभूमि अयोध्या, तिरुपति बालाजी हो या चारोंधाम की यात्रा। जितना बड़ा और मान्यता प्राप्त मंदिर उतनी ज्यादा लूट। तेजी से बढ़ते दौर में लोगों की समस्याएँ इतनी ज्यादा हो चुकी हैं कि भक्त अब भगवान से प्रेम कम बल्कि उनसे डरने लगे हैं और अपना दिमाग ना लगाकर पंडितों के दिमाग से चलने लगे हैं। इस बात का फायदा उठाते हुए धीरे - धीरे यह एक बाजारीकरण में परिवर्तित हो रहा है। यह एक ऐसा बाजार बनकर उभर रहा है जहाँ सैकड़ों तरह के रीति - रिवाज और साथ ही दुःख - दर्द मिटाने के तमाम तरीके जिन्हें करना एक आम इंसान के लिए ना सिर्फ मुश्किल बल्कि सिर के बल खड़े होने के बराबर है। आलम यह है कि मंदिरों में बाहर घूम रहे सैकड़ों पंडा अपनी - अपनी कहानी गढ़ते हुए मंदिर में आए हुए भक्तों को इतना भयभीत कर रहे हैं कि भक्त अब अपना सब कुछ लुटा दे, नहीं तो जो कुछ भी है वो भी चला जाएगा।

मंदिरों में आस्था के नाम पर हो रही धन उगाही एक ऐसा बाज़ार बन गया है जिसमें पंडित अपने अनुसार मंदिर में भेंट चढ़वाते हैं पंडितों का तरीका कुछ इस प्रकार होता है –

पंडित – हथेली में चरणामृत (तुलसी युक्त जल) लीजिये, चरणामृत को हाथ में रखे रहिये. अपना नाम बताइए।
भक्त – राजेश (काल्पनिक नाम)।
पंडित – (पंडित द्वारा कुछ मन्त्र बोलने के बाद) बोलो, मैं राजेश अपनी सभी समस्याओं के निवारण हेतु भगवान् के चरणों में 501 रूपए देना चाहता हूँ।

कुछ इस तरह का वाक्या आपके साथ भी हुआ होगा तब आप बाहर जाकर सोचते हैं कि यार ये अजीब नौटंकी है। मुझे कितना भेंट चढ़ाना है ये मेरी श्रद्धा पर निर्भर करता है नाकि पंडित द्वारा कहे जाने पर ? हर तरफ लूट ही लूट मची हुई है। भक्त अब खुद नहीं समझ पा रहे कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं। देखा - देखी में भक्त ये सब चीजो को अनदेखा कर देते हैं और जो सब कर रहे हैं उसी राह में खुद भी चलने लगते है। अब समय है जागरूक बनने का और सही - गलत में फर्क समझने का .......

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
अर्थ - कर्म ही पूजा है। फल की इच्छा मत करो। समय आने पर फल मिल जाएगा। अपने कर्म करते रहो।

इन पंक्तियो को सभी अच्छे से जानते हैं और समझते भी है इसके बावजूद मंदिरों में कोई भक्त घुटनों में जा रहा है कोई लेट-लेट कर जा रहा है कोई अपनी सारी संपत्ति दान कर रहा है। आखिर भगवान क्यों चाहेंगे कि उनके बच्चे इतना ज्यादा कष्ट सहें और इस झूठी बातों पर जियें कि अगर वो इस तरह के दर्द सहेंगे तो भगवान स्वयं प्रकट होकर उनकी सहायता करेंगे ?

इस पूरे खेल में पंडितों की पूरी गलती है यह कहना गलत है क्योंकि जब भक्त ही अपना सब कुछ लुटा देना चाहते हैं तो फिर पंडित क्यों ना बनाएं धन उगाही का खुला बाजार ... मंदिरों के बाहर बिक रहे दूध के गिलास जिन्हें पीने के लिए कोई नहीं खरीदता बल्कि मंदिरों में चढ़ाने के लिए हजारों लीटर दूध बिकता है जिसका कहीं भी इस्तेमाल नहीं होता। पूरा का पूरा दूध फूलों और पानी के साथ मिलते हुए बह जाता है। क्या ये सब देख भगवान् खुश होते हैं ? बिलकुल ही अजीब समाज में जी रहे है हम लोग...........

अगर आपको मेरे इस लेख में कोई भी बात अच्छी लगी हो तो आज से ही खुद में परिवर्तन लाइए और इन तमाम बातों को दरकिनार कर खुद के दिमाग से काम लीजिये अन्यथा यह सिलसिला ऐसा ही चलता रहेगा ......

-    अर्पित ओमर (पत्रकार)

2 comments:

  1. ye har jagah ho raha hai .... pandit apni manmani chalate hain .... bhakton ki shraddha se unhe koi matlab nahi hai .....
    very nice awareness .... good work arpit :)

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