हम सबने बचपन में
खूब क्रिकेट खेला, कभी पकड़म-पकड़ाई, कभी छुपम-छुपाई तो कभी गेंदताड़ी। इन तमाम खेलों के साथ कुछ
खेल प्रतिस्पर्धा (competition) वाले भी थे जैसे ऊँची कूद, लम्बी दौड़ और भी तमाम। लेकिन ऐसा
क्या बच गया जिसे पढ़ाया गया लेकिन खिलाया नहीं गया। ऐसा क्या रह गया जो बेहद
जरूरी है। न जाने कब से एक सवाल मन में उठ रहा है कि क्यों हर कोई क्रिकेट से
प्यार करता है। क्यों हर कोई सिर्फ क्रिकेट के बारे में ही जानता है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्या इस खेल का कोई अस्तित्व है या नहीं। क्योंकि
राष्ट्रीय स्तर पर तो कोई पूछता नहीं। आप भी सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या है, जो है
पर दिखता नहीं।
आपका राष्ट्रीय खेल।
जी हां, आपका अपना राष्ट्रीय खेल हॉकी। पढ़ा बहुत है कि 11 खिलाड़ी होते हैं। दो टीमें होती हैं जो लकड़ी या फाइबर से बनी स्टिक से गेंद को
विरोधी टीम के नेट या गोल में डालने की कोशिश करती है। इतना तो जानते ही
होंगे, लेकिन क्यों नहीं कभी टीवी पर हॉकी देखते हैं। क्यों कभी आपस में हॉकी के
बारे में बात नहीं करते। क्या इसमें अवेयरनेस की कमी है या इंट्रेस्ट की। या ये
कहें कि हॉकी कभी खेला नहीं तो ज्यादा इंट्रेस्ट भी नहीं। शुरुआत से सब लोग बस
क्रिकेट के दिवाने हैं तो हम भी उसी कतार में लग गये।
एक राष्ट्रीय खेल
होने के नाते हमें सिर्फ पता होना काफी नहीं। इसको बढ़ावा देना चाहिए और बच्चों को
स्कूल और कॉलेज में खिलाना चाहिए जिससे वह अपने राष्ट्रीय खेल को न सिर्फ किताबों
तक सीमित रखें बल्कि उसका वास्तवित रूप से आनंद भी लें। सर्वांगिण विकास के लिये
हॉकी बेहतरीन खेल है। भारत में इस खेल का खूब सम्मान है पर लोगों के बीच दिखता
नहीं ये एक अलग बात है। शायद ही किसी परिवार में बच्चों को बोला जाता होगा कि जाओ
बेटा बाहर जाकर हॉकी खेलो दोस्तों के साथ।
ये वही है जो है पर
दिखता नहीं। खबरों में ही सिमट सी गयी है हॉकी। जो अखबारों में छपती है लेकिन रीडर्स
भी इसे अनदेखा कर दूसरी खबरों की तरफ रुख कर लेते हैं। जरूरत है अवेयर होने की।
जरूरत है स्मार्टफोन खरीदने के बजाय स्मार्ट बनने की। जरूरत है फर्स्ट आने के बजाय
सब्जेक्ट को समझने की, उस विषय की बारीकी से अध्ययन करने की। जरूरत है आपकी सोच
बदलने की...
- अर्पित ओमर
arpit.itees@gmail.com



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