ये दो लाइन किसी पहेली से
कम नही, इसी के साथ अब समय आ चुका है पिछले हफ्ते पूछी गई इसी पहेली का जवाब जानने
का... सोशल मिडिया साइट्स पर बहुत सारे जवाब मिले लेकिन सटीक शब्द में जवाब किसी
ने नहीं दिया... चलिए पढ़ते हैं वो लेख जिसमें छिपा है इसका जवाब ...
रफ़्तार और जल्दबाजी ये दो
शब्द सभी की ज़िन्दगी में कुछ इस कदर बस गए हैं कि रुकना और धैर्य रखना तो शायद
ख़त्म हो गया है. खुद के लाभ के लिए जरुरतमंद की मदद खासकर युवाओं की बात करें तो
बहुत कम देखने को मिलती है. जबतक उनसे आग्रह न किया जाए.
तो चलिए बात करते हैं विजय
(बदला हुआ नाम) की. जी हाँ, ये कोई कहानी नहीं है, ये लेख एक वास्तविक घटना पर
आधारित है जो ये साबित करता है कि खुद के सुख और जल्दबाजी के आगे दूसरे के दुःख का
कोई मोल नहीं है. तारीख 15 जुलाई जगह राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से वैशाली जाते समय
विजय अपनी माँ के इलाज के लिए एक अस्पताल जा रहा था. विजय की माँ बीमारी के चलते काफी
कमजोर और बेजान सी हो गईं थी. मेट्रो में जैसे ही दोनों ने प्रवेश किया तो देखा कि
कोई भी सीट खाली नहीं है. बुजुर्ग आरक्षण पर बच्चा बैठा है और महिला आरक्षण पर
लड़के... सभी देख रहे कि विजय की माँ बीमार दिख रही है लेकिन किसी ने अपनी सीट देना
जरुरी नहीं समझा. क्योंकि वे अपने सुख में ही मग्न थे फिर उनसे ज्यादा जरुरतमंद
कैसे दिखे कोई. विजय ने किसी तरह चार स्टेशन बाद एक खाली सीट पर माँ को बैठाया और
फिर वैशाली पहुंचा. वहां विजय ने ये अनुभव किया कि कुछ तो है जो खो गई है गुम गई है सो गई है.
वैशाली स्टेशन पहुँचने के
बाद विजय अपनी माँ के साथ अस्पताल गया. वहाँ का आलम कुछ ऐसा था कि समझ में ही नहीं
आ रहा था उसे कि बात किससे करें. किसी तरह धक्के खाते हुए विजय अस्पताल के अन्दर
दाखिल हुआ तो देखा मरीज से ज्यादा तीमारदार दिख रहे हैं करीब एक घंटे विजय अपनी
माँ को अपने कंधे के सहारे लेकर खड़ा रहा पर किसी को भी उसका दुःख दर्द नहीं
दिखा... कम्पाऊंडर एक के बाद एक नंबर वाले मरीजों को डॉक्टर को दिखाने के लिए
भेजता जा रहा था पर उसे भी विजय और उसकी माँ की लाचारी दिखाई नहीं दी. विजय न जाने
क्यों उस वकत हैरत में था. लोग आखिर क्यों मुझे और मेरी माँ को अनदेखा कर रहे हैं.
उसे वही एहसास हुआ कि खो गई है गुम गई
है सो गई है.
तो ये थी वास्तविक घटना जिसमें
बात छोटी सी है पर है गहरी. अमूमन आपने भी अपने आस पास देखा होगा. आखिर क्या है वो
जो खो गई है गुम गई है सो गई
है. वो है इक छोटी सी अब हार चुकी है. वो है मानवता. जी
हाँ, आज के समय में मानवता बहुत ही कम देखने को मिलती है फिर वो अस्पताल हो ट्रेन
हो या फिर भीड़ में हिंसा. मानवता शब्द खुद में इतना शक्तिशाली है कि जरूरतमंद को
मदद और तकलीफ वाले व्यक्ति को सहारा दे सकता है. ये सिर्फ किसी एक घटना पर नहीं
निहित है बल्कि रोजाना ज़िन्दगी में निहित है. मानवता सदैव जीवित रखें अपने अंतर्मन
में और हमेशा तत्पर रहें. मानवता में ही
सज्जानता निहित है, जो सदाचार का
पहला लक्षण है। मनुष्य की यही एक शाश्वत पूंजी है।
- अर्पित ओमर
arpit.itees@gmail.com









