Saturday, 14 February 2015

मुझे शिकायत है समय से . . .

जी हाँ, समय . .  जो कभी किसी के लिए नहीं रुकता, कभी किसी की परवाह नहीं करता। कभी अच्छा होता है समय तो कभी बुरा। लोग जिस तरह समय को कोसते हैं उसी तरह मुझे भी एक शिकायत है समय से। आज मेट्रो की रफ़्तार से समय दौड़ रहा है ऐसे में न हम खुद को समय दे पाते हैं और न ही अपने परिवार को। हर एक समस्या के बाद दूसरी समस्या बेसब्री से इंतजार कर रही होती है कि कब मुझमें व्यस्त हो जाओ और समय से शिकायत करो। काश 24 घंटे की जगह अगर 42 घंटे होते तो कितना अच्छा होता। हम कुछ समय अपने परिवार, मित्रों, मनोरंजन व अन्य तमाम कार्यों को आसानी से कर पाते और किसी को कोई बहाना भी नहीं बनाते कि “यार समय नहीं मिला।”

टेक्नोलॉजी का जहाँ एक तरफ लोग अपने समय को बचाने के लिए प्रयोग कर रहे हैं वहीँ दूसरी ओर लोग अब फोन पे ही हाल चाल लेकर बैठ जाते हैं, मिलने की ज़हमत उठाना भी ज़रुरी नहीं समझते। क्या लोग आलसी हो गए हैं ? या समय ही उनकी असली शिकायत है जो उन्हें बांधे रखता है। क्या इसे हम समय में आए परिवर्तन की श्रेणी में रखें या इंसान के व्यवहार में आए परिवर्तन की श्रेणी में ? समय पर अपना ज़ोर पाने के लिए इंसान ने हर सम्भव तरीके से कोशिश की लेकिन परिणामस्वरूप इंसान अपनी ज़रूरतों और असंतुष्टि की वजह से अपने कार्यों और परेशानियों में और ज्यादा फंसता जा रहा है। आखिर क्यों ये समय हमसे ख़फा रहता है और हमें अनचाही परिस्थितियों में फंसा देता है।

अस्पताल में डाक्टर कहते हैं कि “अब समय बहुत कम है जल्दी इलाज करवाइए वरना हम कुछ नहीं कर पाएँगे।” तो जनाब ये बताइए कि और अधिक समय कहाँ से लाऊं, किससे उधार मांगूं ? हर क्षण हर लम्हा हर पल सिर्फ गुहार लगाई जाती है कि भगवान थोडा समय और दे दो। बचपन से ही स्कूल की परीक्षाओं में और अधिक समय माँगना शुरू कर देते हैं कि बस 5 मिनट और मिल जाता तो वो आखिरी सवाल भी हल हो जाता। हर चीज़ का समाधान है इस दुनिया में लेकिन समय पर किसी का ज़ोर नहीं। जन्म से लेकर म्रत्यु तक हम सिर्फ एक ही चीज़ की शिकायत रहती है, और वो है समय। जैसे - जैसे समय नज़दीक आता है हमारे चेहरे पर डर और चिंता साफ़ झलकती है। आज मेरे मन में समय को लेकर शिकायत इसलिए पैदा हुई क्योंकि यह शिकायत सिर्फ मेरी नहीं बल्कि सड़क पर चल रहे हर दूसरे व्यक्ति की है जो अपनी तकलीफों को सिर्फ अपने अन्दर दबा कर रखता है।

सड़क दुर्घटना में सबसे ज्यादा तर्क समय को दोष देते हुए पीड़ित अपने भाव को बताता है कि “काश समय की कमी और जल्दी पहुँचने की ललक मुझमें न होती तो आज मैं इस अस्पताल में ना होता।” क्या समय को पकड़ना ही हमारी सबसे बड़ी भूल और बेवकूफी है ? हम आज उस चीज़ को ज्यादा तवज्जो देते हैं जो हमे नहीं मिल सकती है। हमेशा उसी को पसंद करते हैं जो हमारे समय के अनुकूल नहीं होती, और फिर कहते हैं कि समय ख़राब चल रहा है। ऐसे तमाम मामले हैं जिसमें समय से लोग शिकायत करते हैं आखिर क्यों ? क्यों ? और क्यों ? कभी समय हो तो बैठकर सोचियेगा . . . ओह ! आपके पास तो समय ही नहीं है . . .

- अर्पित ओमर 

Sunday, 8 February 2015

बुजुर्ग महिला का हौसला

रोजाना लखनऊ से कानपुर की रेलयात्रा तो होती रहती है लेकिन कभी कभी यात्रा के दौरान कुछ ऐसे यात्रियों से मुलाकात होती हैं जिनसे मिलने के बाद आपको लगेगा कि इस दुनिया में सिर्फ हमही परेशानियों का सामना नहीं कर रहे हैं सभी के पास अपनी गंभीर समस्याएँ हैं। कोई बीमारी से पीड़ित है तो कोई आर्थिक रूप से, कोई अपने परिवार से परेशान है तो कोई खुद की गलत आदतों से पीड़ित है। इस भागती दौड़ती ज़िन्दगी में खुद के बारे में सोचने के लिए किसी के पास समय नहीं है, सभी खुद में व्यस्त हैं।

बात है उन दिनों की जब नए साल का आगाज हुआ था और लोग अपने शहर या गाँव रेल से जा रहे थे तभी जनरल डिब्बे में एक व्यक्ति अपनी सिगरेट को अँगुलियों में फंसाए हुए बोला कि "माचिस है क्या ?" डिब्बे में बैठे व खड़े सभी यात्री के चेहरे पर उसके प्रति गुस्से की भावना दिख रही थी तभी मैंने जवाब दिया कि "नहीं है लेकिन क्यों चाहिए ?" व्यक्ति बोला कि "दिखाई नहीं देता सिगरेट जलानी है।" मैंने कहा कि "तुम इस सिगरेट से खुद को क्यों बर्बाद कर रहे हो और साथ ही यहाँ बैठे अन्य यात्री भी तुम्हारे धुंए की वजह से तमाम बिमारियों का शिकार हो सकते हैं।"

तभी एक बुजुर्ग महिला छोटे से थैले में ढेर सारे अमरुद के साथ बोलते हुए निकली कि "5 के दो अमरुद, 5 के दो अमरुद।" हालाँकि उस जनरल डिब्बे में तनिक भी जगह नहीं थी कि महिला चलती गाड़ी में एक स्थान से दूसरे स्थान जा सके क्योंकि सभी जनरल डिब्बे इस कदर भरे हुए थे कि सीटों के अलावा लोग डब्बे की जमीन पर भी कुछ खड़े व बैठे हुए थे। वह व्यक्ति उस बुजुर्ग महिला से बोला कि "अमरुद बेच रही हो या बादाम, इतने महंगे" उस बुजुर्ग महिला ने जवाब दिया कि "तुम्हारी सिगरेट से तो लाख गुना अच्छा है ये अमरुद, एक सिगरेट तुम 5 रूपए में खरीदकर खुद को मौत के मुंह में धकेल रहे हो उससे अच्छा है 5 रूपए के दो अमरुद खा लो। तुम सिगरेट - शराब पीकर सारे पैसे बर्बाद करते हो, घर में अनाज का दाना तक नहीं होता लेकिन सिगरेट शराब पीने के लिए तुम लोगों के पास हमेशा पैसे रहते हैं। मै अपना पेट भरने के लिए इस उम्र में भी अमरुद बेच कर अपना घर चला रही हूँ, माना कि अमरुद महंगे बेच रही हूँ लेकिन उनसे तो लाख गुना अच्छी हूँ जिनके हाथ पैर सही सलामत होने के बावजूद सड़क और ट्रेनों में भीख मांगते हैं। मैं बूढी जरुर हो गई हूँ लेकिन जब तक मुझमे जान है तब तक मै काम करुँगी और मेहनत करके अपना पेट भरुंगी।"

व्यक्ति ने कहा कि "सिगरेट से मुझे सुकून मिलता है दुनिया के तमाम झंझटों और सिर दर्दी से राहत मिलती है। बुजुर्ग महिला बोली कि "जिसे तुम राहत का नाम दे रहे हो वो तुम्हारी मौत की आहट है, ये नशा बन चुकी है तुम्हारा। तुम्हे लगता है कि इससे तुम्हे सुकून मिलता है लेकिन असलियत में ऐसा नहीं है। तुम मेरे बेटे की उम्र के हो इसलिए तुम्हे समझा रही हूँ कि गुटखा, सिगरेट और शराब सिर्फ एक नशा है जो इंसान को खाता है।"

उस व्यक्ति ने माफ़ी मांगते हुए बुजुर्ग महिला से कहा कि "आप सही बोल रही हैं मेरे घर में हर रोज इसी को लेकर बहस होती है जिससे मेरे परिवार में अशांति बनी हुई है और आर्थिक रूप से भी मैं कमजोर रहता हूँ साथ ही किसी भी काम में अब मन भी नहीं लगता। आज से ही मैं इस सिगरेट को अपनी ज़िन्दगी से ख़त्म करता हूँ।" ऐसा बोलते हुए व्यक्ति ने अपनी सिगरेट को खिड़की से बाहर फेक दिया और बुजुर्ग महिला से अमरुद खरीदा। मेरे साथ - साथ वहां बैठे सभी यात्रियों के चेहरे पर मुस्कान आ गई और सभी ने बुजुर्ग महिला के हौसले और उसकी विचारों की प्रशंसा की।

- अर्पित ओमर