दीपक के त्योहार से जानने वाली दीपावली आज पटाखों के शोर में तब्दील हो गई है।
काले और जहरीले धुंए की चादर ओढ़े आसमां का आखिर कौन जिम्मेदार है? इस पूरे मुद्दे
पर विस्तृत जानकारी आपको इस लेख में मिलेगी।
बचपन में दीपावली पर खूब निबंध लिखे जिसमें सिर्फ दीपकों, मिठाइयों और पकवानों
का जिक्र करते थे। फिर ये पटाखों का शोर कहां से हमारी जान लेने लगा? कभी-कभी तो सांस लेने में भी
दिक्कत होने लगती है और एहसास होता है कि आखिर क्यों पटाखे जला रहे हैं, जो चीज
हमें मार रही है उससे ऐसी कौन-सी खुशी मिल रही है जो स्वास्थ्य से भी ज्यादा जरूरी
है।
सुप्रीम कोर्ट को पटाखे की बिक्री पर रोक लगाने की ऐसी क्या जरुरत पड़ गई। क्या
हम प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी खुद नहीं निभा सकते? क्या पढ़े-लिखे लोग का
उदाहरण यही है कि पटाखे जलाकर वायु प्रदूषण फैलाएं? क्या हम पर सख्ती हो तब जाकर
हम प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करेंगे?
कुछ लोगों से इस मुद्दे पर बात की लेकिन फिर वही बातें कि दूसरे के धर्म में
भी ऐसा होता है वैसा होता है उस पर विरोध क्यों नहीं करते। तो सवाल ये कि आप दूसरों के पहल का इंतजार क्यों
कर रहे हैं? आप करिए
शुरुआत। एक नज़र इतिहास पर -
कब और किसने पटाखे को दीपावली के पर्व से जोड़ा
भारत का ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिसमें दिवाली के पर्व पर पटाखे जलाना और
पर्यावरण को दूषित करना माना गया हो। पटाखों का अविष्कार चीन में दुर्घटनावश हुआ
था। एक बार चीन के एक शहर में एक रसोइए ने गलती से साल्टपीटर (पोटैशियम नाईट्रेट)
आग पर डाल दिया था, जिसके कारण आग के कलर में परिवर्तन हुआ। अब कुछ
नया देखने को मिला तो लोगों के अंदर उत्सुकता पैदा हुई।
इसके बाद उस रसोइए ने आग
में कोयले और सल्फर का मिश्रण डाला, जिससे काफी तेज़ आवाज के साथ रंगीन आग की लपटें
उठने लगी। और तभी से पटाखे या यूं कहें आतिशबाजी की शुरुआत हुई। भारत के इतिहास
में नजर डालें तो पटाखों की शुरुआत कब और कहां से हुई इसका कोई प्रमाण नहीं है। हालांकि
मुगल शासक औरंगजेब ने साल 1677 में दिवाली को अपने शासनकाल में प्रतिबंधित किया
था।
दिवाली पर पटाखों का इतिहास 1940 से ज्यादा पुराना नहीं
भारत में चेन्नै से 500 किमी की दूरी पर शिवकाशी शहर है। यह शहर पटाखों के शहर
के नाम से जाना जाता है। 20वीं शताब्दी में शिवकाशी में पहली बार पटाखा
कंपनी की शुरुआत हुई थी। इस छोटे से शहर को पटाखों का शहर बनाने का क्रेडिट पी
अय्या नादर और उनके भाई शनमुगा नादर को जाता है।
इन्होंने ही अनिल ब्रांड के
पटाखों का निर्माण किया था। साल 1923 में ये दोनों भाई माचिस बनाने का तरीका सीखने
के लिए कोलकाता गये थे। उसके बाद दोनों ने कारोबार शुरू किया और पहली कंपनी खोली।
नादर ब्रदर्स ने पटाखों को दिवाली से जोड़ने की कोशिश शुरू की। माचिस फैक्ट्री
की वजह से उन्हें पहले से ही प्लेटफॉर्म मिला हुआ था। इसके बाद शिवकाशी में पटाखों
की फैक्ट्री तेजी से फैली। 1980 तक अकेले शिवकाशी में 189 पटाखों की
फैक्ट्रियां थीं। आज लोगों के लिए दिवाली का मतलब पटाखे है लेकिन दिवाली पर पटाखों
का इतिहास 1940 से ज्यादा पुराना नहीं है।
अब इतना सब जानने के बाद एक बात तो साफ है कि त्योहार कभी किसी की जान लेने के
लिए नहीं बल्कि खुशियां बांटने के लिए होते हैं। तथ्यों और खबरों के आधार पर देखें
तो पटाखों से निकलने वाले धुएं से लोगों को सांस से संबंधित तमाम समस्याएं हो जाती
हैं और कहीं न कहीं वो सब लोग जिम्मेदार होते हैं जो पटाखे जलाने में भागीदार होते
हैं।
अगर हम अपने बच्चों, मित्रों और रिश्तेदारों को दीपावली का असल मकसद समझाएं और
पटाखे से होने वाले वायु प्रदूषण के प्रति जागरूक करें तो क्या ये दीवाली खुशनुमा
नहीं हो सकती? सवाल करिए
जवाब आपको आपकी अंतर्आत्मा देगी। इस लेख के साथ हम आप सभी से अनुरोध करते हैं कि त्योहार में खुशियां बांटें न
कि छीनें। उम्र पटाखे जलाने से नहीं खुशियां बांटने से बढ़ती है पटाखे ना सिर्फ आपको बल्कि आने वाली पीढ़ी को कर सकता है बहुत ज्यादा बीमार।
.... आपका भारत, स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत ....
- अर्पित ओमर
arpit.itees@gmail.com


